दहेज़ – ज्योत्स्ना रानी साहू

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टूट जाता है बहत कुछ
एक बाप का तमन्ना
एक मां की आस
एक लड़की का दिल
जब रिश्ता टूटता है
कुछ निर्जीव वस्तू के लिए।

तड़पते हैं कुछ जिंदा जीवन
उछाला जाता है इज्ज़त
सब के सामने
जब लड़की की वजन
ज्यादा हो जाता
दहेज के सामने।

फेक देते उतार कर
उसके स्वाभिमान
उसके सपने
अपनों का साथ
फिर भी बराबरी नहीं होता
तो आग लगा देते उसकी अस्तित्व को।

ज्योत्स्ना रानी साहू

सुंदरगढ़

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